Retrospect and Pray

Here is a poem inspired by Mohanji. The temples, churches, gurudwaras are closed and no place to go and pray. The man had become selfish and  immune to his surroundings and fellow beings. Therefore man is in quarantine to retrospect and pray.

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करुणा
हे पालन हार हे प्रभु
नमन कर रही
तेरे चरणो में
कर कृपा कर कृपा!
करुणा तेरी की
मनुहार करू
दयावान दयालू
तू है कहलाया
मुरादे  पूरी करता आया
जब घबराया तेरे दर आया
दिया है तूने ही सहारा ।
पर  करुणामय भगवान
क्यो रुठ, कर बन्द द्वार
बैठा है, जब दुनिया मे
हो रहा अहाकार
बन्द इंसान घरों में
सुनी सड़के , आसमान
भय से जी रहे सभी
मिलने से भी घबरा रहे
कहाँ करे जा पुकार।
क्यो बन्द कर बैठा है द्वार
बन्द है, बाजार, व्यापार
बाहर निकलने को बेज़ार
सूर्य चाँद तो चमके
नव पल्ललव भी दमके
चिड़ियो का कलरव भी सुने
पर कहाँ है ‘शान्ति’ सौचे इंसान
क्यों बन्द कर बैठा है द्वार
नसीहत तेरी है बलवान
कांप रहा डर के इंसान
मौत का खोफ़
अकेलापन, अपनो को खोने का डर, करे अब पश्चताप
हर इंसान
प्रार्थना है, खोल द्वार
दे दीदार , कर कृपा
हे करुणामय भगवान !
कर कृपा हे करुणामय भगवान
कर कृपा, कर कृपा।

Written by Nirupma Chaudhary